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कोल इंडिया के सीएसआर सहयोग से आईआईटी बॉम्बे की पायलट परियोजना ‘जीवोदया’ को रेशम उत्पादन में बड़ी सफलता
February 1, 2026 | 168 Views
कोल इंडिया के सीएसआर सहयोग से आईआईटी बॉम्बे की पायलट परियोजना ‘जीवोदया’ को रेशम उत्पादन में बड़ी सफलता

रांची। कोल इंडिया के कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) फंड के सहयोग से संचालित आईआईटी बॉम्बे की अनूठी पायलट परियोजना ‘जीवोदया’ ने तीन वर्षों के निरंतर अनुसंधान एवं विकास के पश्चात नैतिक रेशम उत्पादन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

इस परियोजना के अंतर्गत आईआईटी बॉम्बे के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी विकल्प केंद्र (सी-तारा) ने रेशम उत्पादन की एक ऐसी नवीन तकनीक सफलतापूर्वक विकसित की है, जिसमें रेशम के कीड़ों की हत्या की आवश्यकता नहीं होती। पारंपरिक विधियों से अलग, इस तकनीक में रेशम के कीड़े रेशमी धागा उत्पन्न करने के बाद पतंगे (moth) में परिवर्तित होकर अपना प्राकृतिक जीवन चक्र पूर्ण कर पाते हैं। इसीलिए, मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करते इस रेशम को ‘जीवोदया सिल्क’ नाम दिया गया है।

परंपरागत रूप से, शहतूत की पत्तियों पर पलने वाले रेशम के कीड़े अपने चारों ओर कोकून (cocoon) बनाते हैं। रेशम निकालने के लिए इन कोकूनों को उबाल दिया जाता है, जिससे लाखों रेशम कीड़ों की मृत्यु हो जाती है। ‘जीवोदया’ परियोजना ने इस लंबे समय से चली आ रही प्रथा को चुनौती देते हुए करुणा आधारित वैज्ञानिक नवाचार के माध्यम से रेशम उत्पादन की प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित किया है।

अथक प्रयोगों के बाद, ‘सी-तारा’ ने एक दुर्लभ वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है, जिसके तहत रेशम के कीड़ों को कोकून बनाए बिना समतल सतह पर रेशमी धागा बुनने के लिए प्रशिक्षित किया गया। इसके परिणामस्वरूप, अब रेशम के कीड़ों को कोकून बनाने की आवश्यकता नहीं रहती और वे अंततः पतंगे के रूप में मुक्त होकर उड़ान भर पाते हैं। यह उपलब्धि प्राचीन भारतीय दर्शन की उस भावना को साकार करती है -

“मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्” — कोई भी दुःखी न हो

कोल इंडिया ने इस असाधारण प्रयोग को अवधारणा से सफलता तक पहुँचाने में निरंतर सीएसआर सहयोग के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नैतिक और पर्यावरणीय महत्व के साथ-साथ, यह तकनीक रेशम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए आय का एक नया और सतत स्रोत भी प्रदान करती है, जिससे ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिलेगी।

‘जीवोदया’ पायलट परियोजना की सफलता के साथ, यह पहल व्यापक स्तर पर अपनाए जाने तथा सतत और नैतिक रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएँ रखती है।


February 1, 2026 | 169 Views
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