(रांची ऋषभ राजा ) झारखंड हाईकोर्ट ने साइबर अपराध, ब्लैकमेलिंग और निजता के गंभीर उल्लंघन से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी विजय श्रीवास्तव को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है . जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि यह मामला केवल आपसी संबंधों का नहीं है, बल्कि इसमें पीड़िता की गरिमा, निजता और सम्मान को ठेस पहुंचाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता . इस मामले में आरोपी और पीड़िता के बीच पिछले कुछ वर्षों से संबंध थे. लेकिन, बाद में आरोपी ने कथित तौर पर पीड़िता के नाम से फर्जी ई-मेल आईडी और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर उसके आपत्तिजनक फोटो और संदेश प्रसारित किए .
जांच में यह भी सामने आया कि यह सामग्री पीड़िता के कार्यस्थल एमिटी यूनिवर्सिटी के कुलपति व अन्य अधिकारियों को भेजी गई, जिससे उसकी सामाजिक और पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया. पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल करने की धमकी देकर पीड़िता से 25 लाख रुपये की मांग की और पति से तलाक लेने का दबाव भी बनाया . पीड़िता की आपत्तिजनक तस्वीरें सहमति के बिना साझा की साइबर पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया कि आरोपी के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कर फर्जी ई-मेल और सोशल मीडिया अकाउंट बनाए गए .पीड़िता की आपत्तिजनक तस्वीरें उसकी सहमति के बिना साझा की गईं .एफआईआर दर्ज होने के बाद भी आरोपी ने बदनाम करने की कोशिश जारी रखी . एक स्वतंत्र गवाह ने धमकी, ब्लैकमेलिंग और तस्वीरें भेजे जाने की पुष्टि की है. केस डायरी के अनुसार, आरोपी द्वारा बनाए गए इंस्टाग्राम अकाउंट का यूजरनेम कई बार बदला गया, जिससे साइबर अपराध की साजिश और स्पष्ट हुई .आरोपी ने कहा- दबाव बनाने के उद्देश्य केस आरोपी की ओर से दलील दी गई कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे और लगाए गए आरोप झूठे हैं . यह भी कहा गया कि एफआईआर दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है .बचाव पक्ष ने व्हाट्सऐप चैट, बैंक लेनदेन और यात्रा से जुड़े दस्तावेज भी अदालत के समक्ष रखे . अदालत ने माना अग्रिम जमानत से जांच हो सकती है प्रभावित सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही दोनों के बीच संबंध रहे हों, लेकिन इससे दूसरे की निजता, गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं मिल जाता . अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाहित और समझदार महिला होने का तर्क आरोपी को आरोपों से मुक्त नहीं कर सकता . कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत एक असाधारण राहत है और ऐसे मामलों में इसे सामान्य रूप से नहीं दिया जा सकता . सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि आरोपी को अग्रिम जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है . सभी तथ्यों, साक्ष्यों और केस डायरी देखने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी .