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MMDR संशोधन विधेयक 2026: राज्यों के अधिकार और राजस्व पर क्या पड़ेगा असर? क्या है पूरा मामला
September 7, 2026 | 181 Views
MMDR संशोधन विधेयक 2026: राज्यों के अधिकार और राजस्व पर क्या पड़ेगा असर? क्या है पूरा मामला

नई दिल्ली/रांची। खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर देशभर में चर्चा के बीच राजनीतिक रूप से बहस छिड़ी हुई है साथ ही राज्यों के अधिकार, खनिज राजस्व और जमीन के नियंत्रण को लेकर कई सवाल और भ्रांतियां सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह संशोधन खनिज क्षेत्र में कराधान और नियमन से जुड़े प्रावधानों को अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और एकरूप बनाने पर केंद्रित है। दस्तावेज के अनुसार, 13 अगस्त 2026 को संसद ने MMDR संशोधन विधेयक, 2026 को पारित किया।

क्या राज्यों के अधिकार खत्म हो जाएंगे?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इस संशोधन के बाद खनिज संपदा से जुड़े राज्यों के अधिकार कम हो जाएंगे। दस्तावेज के अनुसार ऐसा नहीं है। राज्यों की जमीन पर उनका अधिकार बना रहेगा और खनन से प्राप्त राजस्व में राज्यों का हिस्सा भी जारी रहेगा। इसके अलावा गौण खनिजों के नियमन और नियंत्रण की जिम्मेदारी भी राज्यों के पास ही रहेगी।

विधेयक के सेक्शन 9(घ) के तहत खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर अथवा अन्य शुल्क लगाने का अधिकार राज्यों के पास रहेगा। हालांकि, ऐसे कराधान को केंद्र सरकार द्वारा विनियमित किया जा सकता है।

राज्यों के राजस्व में कटौती नहीं

खनिज क्षेत्र से राज्यों को मिलने वाले राजस्व को लेकर भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि संशोधन का उद्देश्य राज्यों की आय कम करना नहीं है। इसमें राज्यों का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत के स्तर पर बनाए रखने की बात कही गई है।

इसका अर्थ यह है कि खनिज क्षेत्र में कराधान और नियमन की व्यवस्था को स्पष्ट करने के साथ राज्यों के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है।

राज्यों की जमीन पर नहीं होगा कोई असर?

खनिज-युक्त जमीन को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं सामने आती रही हैं। दस्तावेज के मुताबिक MMDR संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य जमीन के मालिकाना हक को बदलना नहीं है।

जिस जमीन पर राज्य का अधिकार है, वह अधिकार इस संशोधन के कारण समाप्त नहीं होता। विधेयक का संबंध मुख्य रूप से खनिज-युक्त भूमि पर कराधान से जुड़े विषयों को स्पष्ट और व्यवस्थित करने से है।

यानी जमीन का मालिकाना हक और खनिज से संबंधित कराधान दो अलग-अलग विषय हैं। इन्हें एक-दूसरे से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।

रेत, बजरी, बोल्डर और मोरम पर राज्यों का नियंत्रण बरकरार

गौण खनिजों यानी Minor Minerals को लेकर भी विधेयक में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। दस्तावेज के अनुसार करीब 50 गौण खनिज राज्यों के नियंत्रण में ही रहेंगे।

रेत, बजरी, बोल्डर और मोरम जैसे खनिजों के नियमन एवं प्रशासन में राज्यों की भूमिका पहले की तरह बनी रहेगी। इन खनिजों का सीधा संबंध स्थानीय निर्माण कार्यों, सड़क, मकान और बुनियादी ढांचे से है। इसलिए इनके प्रशासन में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रॉयल्टी से लेकर DMF और GST तक राज्यों का हिस्सा सुरक्षित

खनन से राज्यों को कई माध्यमों से राजस्व प्राप्त होता है। इनमें रॉयल्टी, ऑक्शन प्रीमियम, जिला खनिज फाउंडेशन यानी DMF और GST में राज्यों का हिस्सा प्रमुख हैं।

दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि इन राजस्व स्रोतों में राज्यों के हिस्से को सुरक्षित रखा गया है। रॉयल्टी से मिलने वाला राजस्व जारी रहेगा, ऑक्शन प्रीमियम से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा बना रहेगा और DMF के माध्यम से मिलने वाले लाभ भी जारी रहेंगे। इसके अलावा GST में राज्यों का हिस्सा भी सुरक्षित बताया गया है।

आखिर संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

अब सवाल यह है कि यदि राज्यों के अधिकार और राजस्व में कटौती नहीं की जा रही है तो फिर MMDR कानून में संशोधन की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

दस्तावेज के अनुसार खनिज क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उद्योग, निर्माण, ऊर्जा, सड़क, रेलवे और बुनियादी ढांचे की अनेक परियोजनाएं खनिज संसाधनों पर निर्भर हैं। समय के साथ इस क्षेत्र में नई परिस्थितियां और चुनौतियां सामने आई हैं। ऐसे में कराधान और नियमन से जुड़े नियमों में स्पष्टता और एकरूपता की आवश्यकता महसूस हुई।

14 तरह की मौजूदा लेवी से व्यवस्था हुई जटिल

खनिज क्षेत्र में अलग-अलग स्तरों पर कई प्रकार के कर और शुल्क पहले से लागू रहे हैं। दस्तावेज के अनुसार राज्यों की ओर से 14 मौजूदा लेवी लगाए जाने की स्थिति में कराधान की व्यवस्था कई बार जटिल हो सकती है।

इसी वजह से स्पष्ट और समान कर व्यवस्था की जरूरत बताई गई है, ताकि सरकार, उद्योग और अन्य हितधारकों के बीच नियमों को लेकर भ्रम की स्थिति कम हो और सभी पक्ष अपने अधिकारों एवं दायित्वों को बेहतर तरीके से समझ सकें।

 

MMDR संशोधन विधेयक के पीछे एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि खनिज क्षेत्र में विकास, निवेश और बेहतर व्यवस्था के साथ राज्यों के अधिकार एवं राजस्व भी सुरक्षित रहें।

दस्तावेज में कहा गया है कि राज्यों के अधिकार बने रहें, उनका राजस्व बना रहे और साथ ही खनिज क्षेत्र में सुधार हो—इसी संतुलन को इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्यों के लिए मुद्दा अहम

खनिज संसाधनों से जुड़े राज्यों के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि खनन से प्राप्त राजस्व राज्य की आर्थिक गतिविधियों और स्थानीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि राज्यों की जमीन नहीं ली जा रही है, गौण खनिज राज्यों के नियंत्रण में रहेंगे और खनन क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व में राज्यों का हिस्सा सुरक्षित रहेगा।

लगभग 90 प्रतिशत खनन क्षेत्र के राजस्व हिस्से को राज्यों के पास बनाए रखने तथा रॉयल्टी, ऑक्शन प्रीमियम, DMF और GST जैसे स्रोतों में राज्यों के हिस्से को सुरक्षित रखने की बात कही गई है।

विकास की रफ्तार बढ़ने से राज्यों को भी लाभ

देश में एक्सप्रेस-वे, रेलवे लाइन, उद्योग, आवास और ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। इन सभी के लिए बड़ी मात्रा में खनिज संसाधनों की आवश्यकता होती है।

यदि खनिज क्षेत्र में नियम सरल और स्पष्ट होते हैं, निवेश का वातावरण बेहतर होता है और परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ती हैं, तो इसका लाभ केवल केंद्र तक सीमित नहीं रहेगा। दस्तावेज के अनुसार इससे रोजगार, स्थानीय कारोबार और राज्यों के लिए आर्थिक अवसर बढ़ सकते हैं।

MMRD का क्या है निष्कर्ष

MMDR संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि राज्यों की जमीन का मालिकाना हक समाप्त नहीं किया जा रहा है, गौण खनिजों पर राज्यों का नियंत्रण बरकरार है और खनन से जुड़े प्रमुख राजस्व स्रोतों में राज्यों के हिस्से को सुरक्षित रखने की बात कही गई है।

ऐसे में इस संशोधन को केवल केंद्र बनाम राज्य के नजरिए से देखने के बजाय खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता, स्पष्ट कर व्यवस्था, निवेश, विकास और राज्यों के आर्थिक हितों के बीच संतुलन के रूप में समझने की जरूरत है।

दस्तावेज में केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच सहयोग और समन्वय बनाए रखते हुए ‘विकसित भारत-2047’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश भी दिया गया है।


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