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धर्मसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध महिलाओं ने दिया आव्हान
March 16, 2026 | 270 Views
धर्मसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध महिलाओं ने दिया आव्हान

रांची। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर आज झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा रांची में "धर्म सत्ता, पितृ सत्ता और महिलाओं की आजादी" पर एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के आयोजन में आदिवासी विमेंस नेटवर्क, कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन (बिहार- झारखंड- अंडमान), संभवा इंजोर, महिला मुक्ति संघर्ष (चतरा), शक्ति अभियान (झारखंड), महिला उत्पीड़न विरोधी एवं विकास समिति समेत कई संगठनों की प्रमुख भूमिका रही। कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों, धर्मों और राजनैतिक सोच से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं ने भाग लिया।

संचालन अलका आईंद, लीना और रोज़ मधु तिर्की ने किया। कार्यक्रम का आधार पत्र किरण ने प्रस्तुत किया। उन्होंने महिला दिवस के क्रांतिकारी इतिहास को याद दिलाया। उन्होंने बताया कि धर्म सत्ता, पितृ सत्ता और राज सत्ता महिलाओं को दोयम दर्जे का इंसान बनाकर रखते हैं। इसके विरुद्ध ही सभी एकजुट हुई हैं। 

सामाजिक कार्यकर्ता नीलम तिग्गा ने कहा कि पुरुष चाहते हैं कि महिला घर के कामों पर ही ध्यान दे और बाहर न जाएं। उनकी आजादी पर अंकुश लगाया जाता है। धार्मिक संगठनों में पुरुष ही निर्णयों को महिलाओं पर थोपते हैं। महिलाओं की जिम्मेवारी स्वागत तक सीमित कर दिया जाता है।

एपवा की नंदिता भट्टाचार्य ने कहा कि महिलाओं ने लड़ाई कर बहुत अधिकारों को जीती हैं। लेकिन आज के दिन देश की सत्ता  इन सब अधिकारों को खत्म कर रही हैं। साथ ही, न्यायालय भी मनुवादी सोच के अनुसार एक के बाद एक महिला विरोधी निर्णय दे रही है।  "राते और सड़कें हमारी है".

थेयोलॉजिकल कॉलेज से जुड़ी प्रोफ इदन टोपनो ने कहा कि सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं और उनकी आंतरिक समीक्षा होनी चाहिए कि महिलाओं को बराबर माना जाता है या हाशिए पर धकेला जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि झारखंड में आदिवासी महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष का सैंकड़ों सालों का इतिहास है। झारखंड अलग राज्य आंदोलन में महिलाओं की प्रमुख भागीदारी थी। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद विभिन्न सत्ताओं में महिलाएं कहां हैं। बड़े बड़े कारोपोरेट घराने महिलाओं के जीवन के हर पहलुओं को तितर बितर कर रहे हैं। अब महिलाओं को राजनैतिक शक्ति अपने हाथ में लेकर इन सब के विरुद्ध लड़ने की जरूरत है।

पश्चिम बंगाल से आई मनीषा ने कहा कि हिंदुस्तान में आजादी के साथ ही महिलाओं को वोट का अधिकार मिला था। लेकिन मोदी सरकार इसे खत्म कर रहीं है। चुनाव आयोग ने बंगाल में जो SIR किया है, उसमें एक करोड़ लोगों का नाम वोटर सूची से कट गया है जिसमें अधिकांश महिलाएं हैं। 

शक्ति क्लब से जुड़ी निकी ने कहा कि धर्म में महिलाओं के लिए बहुत पाबंदी है। सभी समुदायों के महिलाओं के साथ मिलकर वे भी अपनी समुदाय में महिलाओं के अधिकारों के लिया संघर्ष करना चाहती हैं।

महिला मुक्ति संघर्ष समिति, चतरा की संजू देवी ने कहा कि महिलाएं कुछ भी करें लेकिन नाम पुरुषों का ही होता है।

आदिवासी जन परिषद की सेलीना लकड़ा ने कहा कि वे  आदिवासी अधिकारों और जमीन के विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रही हैं। लेकिन जब वे पार्षद चुनाव लड़ी, तब पुरुषों ने साथ नहीं दिया।

पाकुड़ से आई मीना मुर्मू ने कहा कि रोज़ महिलाओं के बलात्कार और कत्ल  हो रहा है। वे लगातार दोषियों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन की रश्मि , प्रियशीला बेसरा, हीरामनी व अन्य महिलाओं ने गानों और कविताओं के साथ अपनी बातों को रखा।
आलम आरा ने कहा कि विभिन्न धर्मों के पुरुष ठेकेदार ही आपस में लड़वाते रहते हैं। हर धर्म की महिलाएं एक हैं और उन सबका शोषण और उसके खिलाफ लड़ाई एक है। 

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि समानता और आजादी के लिए संघर्ष करेंगे और धर्म सत्ता, पितृसत्ता और राज सत्ता दे महिलाओं पर नियंत्रण करने के हर प्रयास का विरोध किया जाएगा।

कार्यक्रम में अशिष्ण बागे, अमल पांडेय, एलिना होरो, बिल्कन डांग, रॉयल डांग, कुमुद, सिराज, टॉम कावला, भरत भूषण चौधरी, माला, नसरीन जमाल, श्रीनिवास, मंथन, सुधांशु शेखर, उत्तम, प्रवीर पीटर, आकांक्षा, मनोज, रोज खाखा आदि साथी भी उपस्थित रहे।


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