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जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित उत्तर मध्य क्षेत्र की दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला संपन्न
January 18, 2026 | 347 Views
जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित उत्तर मध्य क्षेत्र की दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला  संपन्न

रांची।जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित उत्तर मध्य क्षेत्र की दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला 17-18 जनवरी को शगुन मैरेज लॉन, चिरौंदी, रांची में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।

कार्यशाला का विधिवत शुभारम्भ वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय सत्येंद्र सिंह जी, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्री भगवान सहाय जी, जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक  गणेश राम भगत , राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हंसदा , राष्ट्रीय संगठन मंत्री  सूर्य नारायण सूरी , क्षेत्रीय संगठन मंत्री प्रफुल्ल आकांत एवं क्षेत्रीय संयोजक  संदीप उराँव जी द्वारा भगवान बिरसा मुंडा, भारत माता एवं बाबा कार्तिक उराँव की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन व पुष्पार्चन कर किया गया।

कार्यशाला का केंद्र बिंदु जनजाति समाज की सांस्कृतिक सुरक्षा, उसके ऐतिहासिक योगदान तथा D-Listing की संवैधानिक माँग रहा, जिस पर सभी सत्रों में गंभीर एवं विचारोत्तेजक विमर्श हुआ।

भगवान सहाय जी ने अपने संबोधन में कहा कि जनजाति समाज भारतीय इतिहास की मूल धारा रहा है, जिसने रामायण-महाभारत काल से लेकर मुग़ल, अंग्रेज़ी शासन और स्वतंत्रता संग्राम तक संघर्ष और बलिदान की परंपरा को जीवित रखा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद संविधान में जनजातीय संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली की रक्षा के लिए किए गए प्रावधान इसी ऐतिहासिक योगदान की स्वीकृति हैं। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संवैधानिक दृष्टिकोण, 10 जुलाई 1967 की संसदीय माँग तथा 17 नवम्बर 1969 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए D-Listing आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया।

सूर्य नारायण सूरी जी ने कहा कि अब जनजाति समाज को अपनी माँगों के साथ संकल्पबद्ध होकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि D-Listing को लेकर गाँव-गाँव तक स्पष्ट संवाद, ग्राम सभाओं में प्रस्ताव, जनप्रतिनिधियों से संपर्क, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और सांस्कृतिक माध्यमों से जनजागरण ही आंदोलन की वास्तविक ताकत बनेगा।

द्वितीय सत्र में गणेश राम भगत जी ने कहा कि D-Listing की माँग कोई नई नहीं है, किंतु इस प्रकार की कार्यशालाएँ संगठन और समाज में नई ऊर्जा का संचार करती हैं। उन्होंने आत्मीय संवाद और निरंतर संपर्क के माध्यम से इस विषय को जन-जन तक पहुँचाने पर बल देते हुए कहा कि संगठित प्रयास ही आंदोलन को निर्णायक दिशा देंगे।

डॉ. सत्येन्द्र सिंह जी ने जनजातियों से संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों की जानकारी को अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि जनजाति समाज सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है और उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना भारतीय सभ्यता की मूल आत्मा से गहराई से जुड़ी हुई है।

समापन सत्र में प्रफुल्ल आकांत जी ने कहा कि लंबे समय से जनजाति समाज को दिग्भ्रमित करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। आक्रमणों और औपनिवेशिक नीतियों के माध्यम से उसकी सांस्कृतिक विरासत को कमजोर किया गया तथा जनजातीय वीरों के बलिदानों को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला। उन्होंने युवाओं को आंदोलन से जोड़ने और ग्राम स्तर को इसकी मजबूत नींव बताते हुए संगठित तैयारी का आह्वान किया।

डॉ. राजकिशोर हंसदा ने कहा कि जनजाति समाज का उत्थान उसकी सांस्कृतिक शक्ति और सामूहिक एकता से ही संभव है। उन्होंने 1970 के दशक में कार्तिक उराँव द्वारा चलाए गए D-Listing आंदोलन को स्मरण करते हुए कहा कि आने वाला समय जनजाति समाज के लिए निर्णायक है और संगठित चेतना ही वर्षों से हो रहे अन्याय का उत्तर दे सकती है।

कार्यशाला में उत्तर मध्य क्षेत्र के तीनों प्रांत, बिहार, संथाल एवं झारखंड, से लगभग 100 कार्यकर्ताओं की सक्रिय सहभागिता रही। विचार-विमर्श और संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से आंदोलन की भावी रणनीति पर सहमति बनी।

कार्यशाला के अंत में यह सर्वसम्मत निष्कर्ष निकला कि जनजाति समाज को अपने स्वाभिमान, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। गाँव से उठने वाली संगठित चेतना ही राजधानी तक प्रभावी स्वर में पहुँचेगी और भविष्य की दिशा तय करेगी।

कार्यशाला में मुख्य रूप से संदीप उराँव, सोमा उराँव, मेघा उराँव, कामेश्वर साहू, हिंदुआ ओराँव,  दीनबन्धु सिंह, प्रदीप महतो, अंजली लकड़ा, आरती कुजूर, मेघा ओराँव, जगन्नाथ भगत, सन्नी टोपो अंजलि लकड़ा, सुनील उरांव , प्रदीप टोप्पो अजय सिंह भोक्ता व अन्य उपस्थित थे।


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