रांची: झारखंड में बालू का खेल फिर शुरू हो गया है। NGT की रोक हटते ही रांची के सिल्ली-सोनाहातु इलाके में बालू कारोबारियों की सक्रियता बढ़ गई है। चर्चा है कि तैयारी उन तीन घाटों से बालू निकालने की हो रही है, जिनका टेंडर वन विभाग की रोक के कारण हो ही नहीं सकता।
मामला कांची नदी के तीन बड़े बालू घाटों से जुड़ा है -
1. एडरमहातु घाट
2. सोमाडीह घाट
3. डिबाडीह घाट
*क्यों नहीं हो सकता इनका टेंडर?
वन विभाग के रिकॉर्ड में ये तीनों घाट हाथी कॉरिडोर और वाटर कैचमेंट जोन में आते हैं। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार ये जंगली हाथियों के आने-जाने का मुख्य रास्ता है। इसी कारण यहाँ फॉरेस्ट क्लियरेंस नहीं मिलता और नियमानुसार इन घाटों की नीलामी नहीं की जा सकती।
सूत्रों का कहना है कि सिल्ली-सोनाहातु के बाकी घाटों में बालू बहुत कम बचा है, सबसे ज्यादा बालू इन्हीं तीन घाटों में है। इसलिए इन पर नजर है।
*2018 में डीसी ने भी लगाई थी रोक*
यह पहला मौका नहीं है। 2015-16 से 2017-18 के बीच इन तीनों घाटों की बंदोबस्ती राजस्थान के संवेदक संदीप चांडक के नाम हुई थी। तब वन विभाग ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
इसके बाद 24 जनवरी 2018 को रांची के उपायुक्त ने खनन विभाग को लिखित पत्र देकर स्पष्ट किया था कि इन घाटों से खनन वैध नहीं है और संवेदक को जमा राशि का 40 प्रतिशत वापस किया जाए।
अब नया फॉर्मूला - घाट कहीं का, चालान कहीं का
ताजा सूचना के अनुसार योजना यह है कि बालू की निकासी एडरमहातु, सोमाडीह और डिबाडीह से की जाएगी, लेकिन बाजार में बेचने के लिए दूसरे वैध घाटों के चालान का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे कागज पर सब वैध दिखेगा।
अगर ऐसा होता है तो यह न सिर्फ NGT और वन विभाग के नियमों का उल्लंघन होगा, बल्कि सरकार को राजस्व का भी नुकसान होगा।
इस पूरे मामले पर जिला खनन पदाधिकारी और वन प्रमंडल पदाधिकारी की आधिकारिक प्रतिक्रिया आना बाकी है।