रांची। झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति, धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव ने आदिवासी पहचान, पारंपरिक आस्था और धार्मिक गतिविधियों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान केवल जल, जंगल और जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी अपनी पारंपरिक आस्था, पूजा-पद्धति, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई है।
मेघा उरांव ने आरोप लगाया कि पुरुलिया रोड स्थित बिशप हाउस, एसडीसी सभागार और नामकुम बगीचा में बैठकर आदिवासी एवं जनजातीय समाज की पहचान, संरक्षण, संवर्धन और विस्तार की बातें करना विरोधाभासी है। उन्होंने इसे ‘दूध की रखवाली बिल्ली से कराने’ वाली कहावत से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि जिन लोगों की विचारधारा आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था और पहचान से अलग है, वे आदिवासी पहचान के संरक्षण की बात किस आधार पर कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरना, मसना, चाला, जाहेरथान, मांझीथान, पाहन, पुजार, नायके, अखड़ा, धुमकुड़िया और पड़हा जैसी परंपराएं आदिवासी समाज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके अनुसार आदिवासी समुदाय की पहचान उसकी प्रथागत परंपराओं, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और पारंपरिक संस्थाओं से भी निर्धारित होती है।
मेघा उरांव ने आरोप लगाया कि एक ओर आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था, विश्वास और पूजा-पद्धति को प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज की पहचान और उसके संरक्षण-संवर्धन की बात की जा रही है। उन्होंने इसे दोहरी नीति करार देते हुए कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान, परंपरा और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के सवाल पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व को लेकर स्पष्ट नीति और गंभीर पहल की आवश्यकता है। पारंपरिक आस्था, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किए बिना केवल आदिवासी हितों की बात करना अधूरा प्रयास है।
मेघा उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए लगातार आवाज उठाता रहेगा। उन्होंने संबंधित संगठनों और संस्थाओं से आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को समझने तथा उनके संरक्षण की दिशा में ठोस पहल करने की मांग की।