रांची। अखिल भारतीय रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा संचालन समिति के द्वारा प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया मामले में जानकारी देते हुए बताया गया ,रोहतासगढ़ किला रोहतास (बिहार) जिला में अवस्थित है। मान्यता है, इतिहास साक्षी है, रोहतासगढ़ जनजाति समाज के पूर्वजों का प्राचीन धरोहर है। यहाँ मुगल आक्रमणकारियों के पूर्व उराँव, खरवार और चेरो जनजाति राजाओं का एक समय में साम्राज्य हुआ करता था जिसमें उराँव राजा के शासन काल को स्वर्णकाल भी माना गया। उराँव समाज के पूर्वज यहीं के थे अर्थात् समाज के मान्यताओं के अनुसार उराँव” का उद्भव यही से हुआ है। “उरगन ठाकुर उराँव राजा, यहाँ के राजा थे। राजा हरिषचन्द्र एवं उनके सुपुत्र रोहिताष्व को भी उराँव’ समाज ने अपना पूर्वज मानता है। कालातंर में रोहतासगढ़ किला, मुगल पठान व अंग्रेज शासकों के अधीन में चला गया। उराँव’’ वीरांगना सिनगी दई-कैली दई के नेतृत्व में मुगल पठानों के बीच तीन-तीन बार युद्ध विजय के पश्चात् उराँव समाज अपने पूर्वजों के धरोहर रोहतासगढ़ से पलायन कर गये और इसीलिए उराँव समाज में महिलाओं के चेहरों मे तीन लकीर गोदना की परम्परा प्रारंभ यहीं से हुई। जनी षिकार’’ की कथा और गीत आज भी गायी जाती है। जनी षिकार’’ हर बारह साल में महिलाएं-पुरूष वेष धारण कर जनी षिकार’ उत्सव मनाती है।
जनजाति समाज महादेव को अपना बड़ा देवता और भगवान मानते हैं, पार्वती माँ को देवी के रूप में आराधना व उनकी पूजा की जाती है। विशेषकर उराँव समाज में पूजन-अर्चन व्यवहार में है। और उन्हें धार्मिक गुरू भी मानते हैं। रोहतासगढ़’’ में महादेव-पार्वती का मन्दिर आज भी विराजमान है। रोहतासगढ़’’ के भव्य परिसर में करम’’ वृक्ष देवता के रूप में विद्यमान है। जनजाति समाज करम पर्व परम्परागत रूप में आज भी अपने गाँव में मनाते हैं। रोहतासगढ़ में करम देवता की भी पूजा की जाती है। जनजाति समाज रोहतासगढ़’’ को पूर्वजों का प्राचीन धरोहर सिर्फ मानते ही नही बल्कि अपना श्रद्धा स्थान व देव स्थान मानते हैं। अपने समाज के लोक कल्याण के निमित वहाँ की पवित्र धरती रोहतासगढ़ का नाम स्मरण करते हैं, यही समाज की मूल मान्यता है।
‘‘रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा का उदेष्य’’ - सन् 2006 से श्रद्धेय जगदेवराम उराँव पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, कल्याण आश्रम जषपुर के प्रेरणा से रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा प्रारंभ हुआ है, जो आज तक चल रहा है और अब सामाजिक-धार्मिक अभियान यात्रा बन चुका है। जनजाति समाज अपने पूर्वजों के देव-धारा रोहतासगढ़ प्राचीन धरोहर का दर्षन-पूजन कर पूण्य के भागी बनें और अपने पूर्वजों की अस्मिता-अस्तित्व को स्मरण कर हर तीर्थ यात्री का स्वाभिमान का भाव जागरण हो तथा अपने समाज, अपनी संस्कृति-परम्परा-पहचान, तीज-त्यौहार की रक्षा, समाज संगठित होकर कर सके। युगों-युगों तक भावी पीढ़ी भी रोहतासगढ़ की महिमा का गुणगान करता रहे। रोहतासगढ़ किला एक राष्ट्रीय स्मारक मात्र न होकर विष्व विख्यात पर्यटक स्थल हो, इसका सम्पूर्ण संरक्षण-संवर्द्धन हो एवं पठारी क्षेत्र के समाज में रोटी-कपड़ा-मकान जैसी सुविधाओं का पूर्ण विकास की शासकीय योजना बने, यह आवाज जन-जन की बने। इसीलिए हर साल माघी पूर्णिमा के पवित्र दिन में रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा का आयोजन होता है। सड़क, बिजली, षिक्षा की सुविधा गांव-गांव में पहुँच रही है। यातायात सुगम होता जा रहा है। यह यात्रा की ही उपलब्धी हम मानते हैं।
20वाँ रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा- आगामी महीना माघी पूर्णिमा (रविवार) 1 फरवरी 2026 को 20वाॅ रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा महोत्सव का आयोजन रोहतासगढ़ के भव्य प्रांगन में होने जा रहा है। देष के 10 राज्यों से एवं देष के कोने-कोने से 5,000 तीर्थ यात्रीगणों का 31 जनवरी 2026 को सायं के पूर्व सरस्वती षिषु विद्या मंदिर तिलैथू प्रांगन में होने जा रहा है और दूसरे दिन 1 फरवरी 2026 (दिन-रविवार) को सभी तीर्थ यात्री रोहतासगढ़ तीर्थ धाम का दर्षन महादेव-पार्वती-करम वृक्ष देवता का पूजन-अर्चन हेतु प्रस्थान करेंगे और रोहतासगढ़ तीर्थ महोत्सव में भाग लेकर उसे सफल करेंगे। इस प्रेसवार्ता में संदीप उरांव, मेघा उरांव, सोमा उरांव, अंजली लकड़ा, सन्नी टोप्पो, हिन्दुवा उरांव, जगरनाथ भगत, आरती कुजूर, साजन मुंडा, कैलाश मंडा, बिसू उरांव, प्रदीप लकड़ा, नकुल तिर्की, दुर्गा उरांव, प्रदीप टोप्पो इत्यादि उपस्थित रहे।