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उलगुलान परिवर्तन यात्रा के जरिए आदिवासी-मूलवासी अधिकारों और जवाबदेही की उठी आवाज
September 13, 2026 | 171 Views
उलगुलान परिवर्तन यात्रा के जरिए आदिवासी-मूलवासी अधिकारों और जवाबदेही की उठी आवाज

रांची। राजधानी रांची के हटिया स्थित मौजा कल्याणपुर सरना स्थल, सोलंकी चौक में उलगुलान परिवर्तन यात्रा एवं सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के माध्यम से आदिवासी-मूलवासी समाज के जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, रोजगार, स्थानीय नीति और सम्मान से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार, प्रशासन और सभी राजनीतिक दलों से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गई।

सभा में वक्ताओं ने कहा कि झारखंड अलग राज्य के गठन के 78 वर्ष बाद भी आदिवासी-मूलवासी समाज के कई मूल सवाल पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। जिस एकजुटता और संघर्ष की भावना से झारखंड अलग राज्य के आंदोलन को मजबूती मिली थी, उसी एकता और संघर्ष की भावना को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता है।

आयोजकों ने स्पष्ट किया कि उलगुलान का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि संवैधानिक, लोकतांत्रिक और कानूनी अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण एवं संगठित संघर्ष है। उन्होंने कहा कि झारखंड में अब तक बनी विभिन्न सरकारों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि राज्य निर्माण के जिन मूल उद्देश्यों और अधिकारों के लिए संघर्ष किया गया था, वे आज भी अधूरे क्यों हैं।

चुनाव के समय ही जनता की याद क्यों?

उलगुलान परिवर्तन यात्रा के माध्यम से राजनीतिक दलों से सवाल करते हुए कहा गया कि क्या आदिवासी-मूलवासी समाज को केवल चुनाव के समय ही याद किया जाएगा? जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जनता के प्रति जवाबदेही क्यों सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए।

वक्ताओं ने सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार, लापरवाही और अनियमितताओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि सरकारें अस्थायी होती हैं, लेकिन सरकारी विभाग और प्रशासनिक व्यवस्था स्थायी होती है। ऐसे में जनता के कार्यों और अधिकारों के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

आयोजकों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं है, बल्कि जनता के संवैधानिक अधिकारों और झारखंड के हित में जवाबदेही की मांग करना है।

भूमि और राजस्व व्यवस्था में जवाबदेही की मांग

सभा में झारखंड भूमि संरक्षण एवं राजस्व जवाबदेही आयोग के गठन की मांग प्रमुखता से उठाई गई। आयोजकों के अनुसार आयोग को भूमि संबंधी अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच, अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रभावी शक्ति दी जानी चाहिए।

इसके साथ ही राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतों की समयबद्ध एवं निष्पक्ष जांच की मांग की गई। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई तथा भ्रष्टाचार से अर्जित अवैध संपत्ति की कानूनी प्रक्रिया के तहत जब्ती की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही गई।

विशेष भूमि फास्ट-ट्रैक न्यायालय की मांग

भूमि विवादों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष भूमि फास्ट-ट्रैक न्यायालय अथवा विशेष न्यायिक व्यवस्था स्थापित करने की मांग भी की गई। इसमें अवैध कब्जा, फर्जी जमाबंदी, फर्जी म्यूटेशन, भूमि अभिलेखों में हेराफेरी, आदिवासी भूमि के अवैध हस्तांतरण तथा भूमि रिकॉर्ड में अनियमितताओं से जुड़े मामलों का समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारा सुनिश्चित करने की मांग रखी गई।

विस्थापितों के लिए आयोग और पुनर्वास की मांग

कार्यक्रम में राज्य विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग के गठन की मांग भी उठाई गई। आयोजकों ने कहा कि विकास परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासी और मूलवासी परिवारों को न्याय, उचित पुनर्वास और उनके वैधानिक अधिकार दिलाने के लिए आयोग को पूर्ण रूप से कार्यशील बनाया जाना चाहिए।

प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय जनजातीय भाषाओं को मिले स्थान

सभा में प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय जनजातीय भाषाओं को उचित एवं प्रभावी स्थान देने की मांग की गई। कक्षा एक से पांच तक बच्चों को उनकी स्थानीय अथवा मातृ जनजातीय भाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने तथा आवश्यकता के अनुसार स्थानीय भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति की मांग रखी गई।

इसके अलावा स्थानीय नीति, नियोजन नीति, विस्थापन एवं पुनर्वास नीति, रोजगार नीति, शिक्षा नीति, कृषि नीति तथा जल-जंगल-जमीन के अधिकारों को लेकर व्यापक जनसंवाद और ठोस नीति बनाने की मांग की गई।

जनता के अधिकारों के लिए एकजुट होने का आह्वान

कार्यक्रम में नीरजंना हरेंज, अजय टोप्पो, पूर्ण चंद्र मुंडा, आशुतोष चेरो, मनोज केरकेटाह, तेजस, निर्मल खाखा, मदन मुंडा, उज्जवल टोप्पो, छोटू मुंडा सहित वार्ड पार्षद सुनीता तिग्गा समेत अन्य लोगों ने जनता को अधिकारों के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।

आयोजकों ने कहा कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति, अधिकारी या राजनीतिक दल के खिलाफ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है। यह भ्रष्टाचार, अन्याय, प्रशासनिक लापरवाही और जनता के अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संघर्ष है।

 


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