रांची। विश्वविद्यालय, उर्दू विभाग में राष्ट्रीय संविधान दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद रिज़वान अली ने कहा कि संविधान एक जीवंत और गतिशील दस्तावेज़ है जो हर युग में मार्गदर्शन प्रदान करता है और जो प्रत्येक नागरिक को मूल अधिकारों, स्वतंत्रता, समानता और न्याय की गारंटी देता है। उन्होंने समानता के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, शोषण के विरुद्ध संरक्षण और संवैधानिक उपचार के अधिकार को लोकतांत्रिक समाज की आधार-शिलाएँ बताया।उन्होंने आगे कहा कि संविधान नागरिकों पर कुछ मौलिक कर्तव्य से आगाह करता है।
डॉ. मोहम्मद रिज़वान अली ने इस अवसर पर संविधान निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल की अद्वितीय भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि“दस्तूर-साज़ असेंबली में उस समय लगभग 80 मुस्लिम सदस्य मौजूद थे, लेकिन विडम्बना यह रही कि उन्होंने ग़रीब, पिछड़े और उपेक्षित मुसलमानों के लिए कोई प्रभावी संवैधानिक पहल नहीं की। इसके विपरीत सरदार वल्लभभाई पटेल वह व्यक्तित्व थे जिन्होंने 1934–35 के Government of India Act के संदर्भ में स्पष्ट रूप से यह मत रखा कि सामाजिक पिछड़ापन धर्म से परे है। इसलिए ग़रीब मुसलमानों विशेषतया धार्मिक दलित एवं अत्यंत पिछड़े तबकों को भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने पर विचार होना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि सरदार पटेल का यह दृष्टिकोण धार्मिक राजनीति पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित था, और यही उनके राष्ट्रवादी चिंतन और व्यापक मानवीय दृष्टि का प्रमाण है। इसी कारण आज उनकी महत्ता और प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। डॉ. रिज़वान अली ने कहा कि पटेल की संवेदनशीलता तथा न्याय-आधारित सोच आज भी सामाजिक न्याय के क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करती है।
कार्यक्रम में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हामिद अली खान, डॉ अरशद असलम, डॉक्टर एजाज अहमद,आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर प्रोफेसर साबिर अली,इंतखाब अली, शमा आफरीन ,सदफ कायनात ,शाहिना परवीनर्कैया बानो, आरजू परवीन,मासूमा परवीन,मोहम्मदकलाम,मुश्तरी बेगम,कोपल खातून, मोहम्मद शाहिद, कलीम अशरफ मिस्बाही,के साथ बड़ी संख्या मे शोधार्थियों के अलावा एम ए के छात्र उपस्थित रहे।