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झारखंड सरकार वन अधिकार क़ानून 2006 लागू करने विफल - जनाधिकार महासभा
December 18, 2025 | 353 Views
झारखंड सरकार वन अधिकार क़ानून 2006 लागू करने  विफल - जनाधिकार महासभा

रांची। अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (आगे वन अधिकार कानून) एक ऐतिहासिक कानून है, जो वन आश्रित समुदायों को वन और वन संसाधनों पर उनके उन परंपरागत अधिकारों को पुनर्स्थापित करता है, जिन्हें औपनिवेशिक काल और आजादी के बाद उनसे छीन लिया गया था। यह अधिनियम पुनर्स्थापन की प्रक्रिया भी निर्धारित करता है।इस कानून को लागू हुए 17 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसका  लाभ आज तक झारखंड के वन आश्रित समुदायों को पूर्ण रूप से नहीं मिल पा रहा है।
यह कानून जिन अधिकारों को मान्यता देता है, उनमें सबसे महत्वपूर्ण अधिकार धारा 3(1)(झ) के अंतर्गत "जंगल का संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन करने का अधिकार" है। वन विभाग के विरोध के कारण आज तक झारखंड में 'सामुदायिक वन संसाधनों' पर एक भी अधिकार पत्र निर्गत नहीं किया गया है।जंगल का उपयोग करने के सामुदायिक अधिकार पत्रों में भी कई अधिकारों की कटौती की जाती है और अधिकार क्षेत्र को भी घटा दिया जाता है, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी है। इसके अलावा, वन भूमि को अपनी आजीविका के लिए उपयोग करने के अधिकार पत्रों में भी बड़े पैमाने पर कटौती की जा रही है या उन्हें निरस्त किया जा रहा है।

इसलिए, हम इस कानून के क्रियान्वयन के संबंध में कुछ मूल्यांकन करना आवश्यक समझते हैं।


1. इस कानून के अंतर्गत वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में तीन स्तर के अधिकारी/निकाय हैं: ग्राम सभा, अनुमंडल स्तरीय समिति और जिला स्तरीय समिति। इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ग्राम सभा की है। विडंबना यह है कि प्रशासनिक अधिकारी ग्राम सभा को एक सक्षम प्राधिकारी मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ग्राम सभा को मात्र " भीख माँगने वालों की भीड़" समझा जाता है। ग्राम सभा की लगभग सभी भूमिकाओं को प्रशासनिक अधिकारी अपने पास रखते हैं। कानून में कहीं भी वन विभाग या वन प्रमंडल पदाधिकारी को दावों के भौतिक सत्यापन करने का अधिकार नहीं दिया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वन प्रमंडल पदाधिकारी बैठक में जो कहते हैं, उसी को जिला स्तरीय समिति मान लेती है और पूरे जिले में हजारों दावों को निरस्त कर दिया जाता है। फलस्वरूप, कानून की मंशा के अनुरूप प्रक्रिया नहीं चल रही है।
2.    वन अधिकार दावों का भौतिक सत्यापन: दावा किए गए वन क्षेत्र का भौतिक सत्यापन वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वन अधिकार नियम 2012 में सत्यापन की एक पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया दी गई है। उसके अनुसार, सत्यापन करने का अधिकार सिर्फ ग्राम सभा और उसकी वन अधिकार समिति (FRC) को है (अधिनियम 6(1), नियम 12(1), 11(2)(iv))।भौतिक सत्यापन को पारदर्शी बनाने के लिए FRC उस वन क्षेत्र में हित रखने वाले सभी पक्षों—दावेदार, वन विभाग और राजस्व विभाग—को पूर्व सूचना देकर भौतिक सत्यापन करती है (नियम 12(1))। आमतौर पर, नियम 12 क (1) के अंतर्गत लिखित सूचना के बावजूद वन और राजस्व विभाग भौतिक सत्यापन में उपस्थित नहीं होते हैं। यदि वे उपस्थित होते भी हैं, तो वे अपने प्रतिवेदन पर पदनाम, तारीख और हस्ताक्षर नहीं करते हैं। यह नियम 12क(1) का स्पष्ट उल्लंघन है और वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया को जान-बूझकर अटकाना है।


3.    दावा अभिलेख अनुमंडल में जमा होने के बाद, वन विभाग के अधिकारी अनुमंडल और जिले से उन अभिलेखों को ले जाते हैं और अपने स्तर पर सत्यापन करते हैं, जिसके लिए वे अधिकृत नहीं हैं। वे इन दावों के खिलाफ प्रतिकूल प्रतिवेदन लिखकर जमा कर देते हैं।
4.    अनुमंडल और जिला स्तरीय समिति को ग्राम सभा के प्रस्ताव पर विचार करके निर्णय लेना चाहिए (नियम 3(1)(ग))। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अनुमंडल स्तरीय समिति वन और राजस्व विभाग के गैर-कानूनी प्रतिवेदनों के आधार पर और जिला स्तरीय समिति वन प्रमंडल पदाधिकारी की सिफारिश के आधार पर निर्णय लेती है, जो पूर्णतः  गैर-कानूनी है।
5.    वन अधिकारों को निहित करना एक अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) प्रक्रिया है। इसीलिए दावेदार को अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य देना पड़ता है। उसी तरह, यदि वन विभाग किसी दावे के खिलाफ कोई प्रतिवेदन देता है, तो उसे भी उसका साक्ष्य देना अनिवार्य है। लेकिन अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियाँ वन विभाग द्वारा लिखित या मौखिक रूप से कही गई किसी भी बात को स्वीकार कर लेती हैं और दावों को निरस्त कर देती हैं या दावित वन क्षेत्र में कटौती कर देती हैं।
6.    उपरोक्त के अलावा, अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियाँ कानून के स्पष्ट प्रावधानों (जैसे नियम 12क(3, 6, और 7)) का खुलेआम उल्लंघन करती हैं।
झारखंड सरकार ने चुनाव के समय वादा किया था कि सत्ता में आने पर वन अधिकार कानून को ईमानदारी से लागू किया जाएगा और व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकार पत्र बांटे जाएंगे। सरकार के गठन हुए एक साल बीत गया है, परंतु स्थिति अत्यंत निराशाजनक है।

अतः  हम झारखंड सरकार से निम्नलिखित मांग करते हैं:

1.    झारखंड सरकार अपने चुनावी वादे पूरे करे। तत्काल, समय-सीमा के अंदर सभी लंबित दावों पर विचार कर वन अधिकार पत्र निर्गत करने के लिए सभी जिलों के उपायुक्तों को निर्देश दिया जाए।
2.    वन विभाग के गैर-कानूनी हस्तक्षेप पर तत्काल रोक लगाई जाए।
3.    अधिनियम की धारा 3(1)(झ) के अंतर्गत सभी गांवों को सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार पत्र निर्गत किए जाएं (नियम 12ख(3 और 4))।
4.    इस कानून के तहत ग्राम सभा के अधिकारों का सम्मान किया जाए।
5.    अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियों को निर्देश दिया जाए कि वे कानून के प्रावधानों का अक्षरशः और उसकी मूल मंशा के अनुरूप पालन करें।

इस अवसर मुख्य रूप से 

 
संजय बसु मल्लिक (रांची), नंदकिशोर गंझू (लातेहार), चन्दन दास (धनबाद), चुन्नीलाल सोरेन(हजारीबाग), अवध सिंह (पलामू), रिया तुलिका पिंगुआ (रांची), एलिना होरो(रांची), जॉर्ज मोनिप्पल्ली (लातेहार),मानिकचंद कोरवा(गढ़वा), जेम्स हेरेंज (पलामू), गुलाब चंद्रा(बोकारो), रामेश्वर उरांव(लातेहार)


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